गेंदे (Marigold) की व्यावसायिक खेती में समय पर दिया गया पोषण फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों तय करता है। जब गेंदे की फसल 45 दिन की हो जाती है, तो यह उसकी वृद्धि का सबसे संवेदनशील और निर्णायक चरण होता है।
इस अवस्था पर मिट्टी के माध्यम से जड़ों तक सही पोषक तत्व पहुँचाना (ड्रेंचिंग) पौधों को सीधे फूलों के बड़े आकार, बेहतर रंग और भारी वजन के लिए तैयार करता है। इस समय ओ’नील (00:40:39 + Fe + Mg) का प्रयोग फसल में कई फायदे पहुँचाता है।
- नाईट्रोजन – 0 % होने का महत्व
45 दिन की अवस्था पर पौधे को नाईट्रोजन की पूर्ति अन्य उत्पादों से होती है तो इसकी खास आवश्यकता नहीं होती । क्योकि,
- अत्यधिक शाकीय वृद्धि पर रोक: यदि इस समय नाईट्रोजन दिया जाएगा, तो पौधा केवल पत्तियाँ और टहनियाँ ही बनाता रहेगा और उसमें फूल देरी से आएँगे।
- रोगों से बचाव: अत्यधिक नाइट्रोजन से पत्तियाँ बहुत मुलायम हो जाती हैं, जिससे चूसक कीटों (Thrips, Aphids) और फफूंद जनित रोगों का हमला बढ़ जाता है।
- फूलों पर ध्यान केंद्रित होना: नाइट्रोजन न होने से पौधा अपनी पूरी ऊर्जा नई पत्तियाँ बनाने के बजाय कलियों और फूलों के निर्माण में लगाता है।
- फास्फोरस – 40 %
45 दिन की अवस्था में फास्फोरस का सबसे अहम योगदान होता है:
- कलियों (Buds) का निर्माण: फास्फोरस पौधे में जनन वृद्धि को प्रेरित करता है। यह हर शाखा पर अधिक से अधिक कलियाँ बनाने का काम करता है।
- जड़ों का विकास: यह जड़ों के द्वितीयक और तृतीयक तंत्र को मजबूत करता है, जिससे पौधा मिट्टी से पानी और अन्य पोषक तत्वों को आसानी से सोख पाता है।
- ऊर्जा का स्थानांतरण: पौधे के अंदर बनने वाली ऊर्जा (ATP) को जड़ों से फूलों की कलियों तक पहुँचाने का काम फास्फोरस ही करता है।
- पोटाश – 39 %
पोटाश को गेंदे की फसल के लिए “गुणवत्ता और वजन” बढ़ाने वाला तत्व माना जाता है:
- फूलों का आकार और ठोस वजन: पोटाश कोशिकाओं के आकार को बढ़ाता है और पंखुड़ियों के घनत्व को मजबूत करता है, जिससे फूलों का व्यास (Size) और वजन बढ़ता है।
- रंग और चमक: यह फूलों में प्राकृतिक रंग के पिगमेंट को सक्रिय करता है, जिससे गेंदे का रंग गहरा नारंगी या पीला और अत्यंत चमकदार बनता है।
- तने की मजबूती: 45 दिन के बाद फूलों का वजन बढ़ता है। पोटाश तने की दीवार को कठोर बनाता है ताकि भारी फूलों के बोझ से या हवा चलने पर पौधा गिरे या टूटे नहीं।
- शेल्फ लाइफ (Shelf Life): पोटाश से भरपूर फूलों को तोड़ने के बाद भी वे जल्दी मुरझाते नहीं हैं और बाज़ार तक ले जाने में तरोताज़ा बने रहते हैं।
- 4. आयरन / लोहा का महत्व
गेंदे में आयरन का मुख्य काम पौधे के आहार निर्माण और एन्जाईम गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाना है,
- क्लोरोफिल (हरा पदार्थ) का निर्माण: हालांकि आयरन स्वयं क्लोरोफिल का हिस्सा नहीं होता, लेकिन क्लोरोफिल बनाने की प्रक्रिया में यह कैटालिस्ट (उत्प्रेरक) के रूप में कार्य करता है।
- नई पत्तियों और कलियों को पीला पड़ने से रोकना: आयरन की कमी से पौधे की ऊपरी/नई पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं (जिसे Iron Chlorosis कहते हैं)। ड्रेंचिंग में आयरन मिलने से पौधा पूरी तरह हरा-भरा रहता है।
- एन्जाईम और श्वसन क्रिया: यह पौधे के अंदर श्वसन (Respiration) और ऊर्जा प्रबंधन को नियंत्रित करता है, जिससे कलियाँ तेजी से विकसित होती हैं।
- 5. मैग्नीशियम का महत्व
मैग्नीशियम को पौधे के लिए “भोजन पकाने का इंजन” माना जाता है:
- प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) का केंद्र: मैग्नीशियम क्लोरोफिल अणु का मुख्य केंद्रीय तत्व होता है। इसके बिना पौधा सूरज की रोशनी से भोजन (शर्करा/कार्बोहाइड्रेट) नहीं बना सकता।
- भोजन का फूलों तक पहुँचना: मैग्नीशियम पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को जड़ों और फूलों की कलियों तक स्थानांतरित करने में मदद करता है।
- गहरा हरा रंग और चमक: यह पत्तियों को गहरा हरा रंग देता है। जब पत्तियाँ स्वस्थ और गहरी हरी होंगी, तभी पौधा पर्याप्त ऊर्जा बनाकर फूलों का रंग और आकार बेहतर कर पाएगा।
- फास्फोरस को सोखने में मदद: मैग्नीशियम और फास्फोरस का आपस में गहरा संबंध है। मैग्नीशियम पौधे को मिट्टी/घोल से फास्फोरस ($40\%$) को तेजी से सोखने में मदद करता है।
- मात्रा:
ड्रिप: ओ’नील : 5 किलो प्रती एकड़

